हमर छत्तीसगढ़

बालोद नगरपालिका का जल-युद्ध नागरिकों का खून जल रहा लेकिन पालिका का तंत्र सो रहा

बालोद नगरपालिका का जल-युद्ध नागरिकों का खून जल रहा लेकिन पालिका का तंत्र सो रहा

बालोद नगरपालिका का जल-युद्ध नागरिकों का खून जल रहा, लेकिन पालिका का तंत्र सो रहा

 

बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिला के इस कथित ‘विकास मॉडल’ शहर में पेयजल अब राजा-रानी का सुख बन चुका है, जबकि सड़क पर लोग तरसते नजर आते हैं। नल बंद है कुछ नहीं उगल रहे हैं—गंदगी की परतें चढ़ी है शहर बैक्टीरिया का अड्डा है जहरीली घुटन भरी दुर्गंध। क्या यही शहर की व्यवस्था है या महामारी का न्योता? जनता चीख रही, लेकिन इकाई का सिस्टम कछुआ गति से लंगड़ा रहा। अध्यक्ष प्रतिभा चौधरी? वे तो बस एक नाटकीय अभिनेत्री—अंगूठे चूसते हुए ‘बेचारी’ का स्वांग रच रही हैं, जैसे ऊपरवाले ने उन्हें जन्म से ही बंधनग्रस्त कर दिया हो। हद है! वोटों से सत्ता चखी, अब जन-दर्द से पल्ला झाड़ना? यह लोकतंत्र का अपहरण है, न कि सेवा का व्रत! वार्डों में अराजकता का तांडव चल रहा—टैंकर आते हैं तो देर रात, या फिर गायब हो जाते हैं जैसे चोरों का कुनबा।

महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग—सब घंटों धूप में पसीना बहा कर एक-एक बूंद के लिए कुश्ती लड़ते है। अक्टूबर का यह सूखा तो ट्रेलर मात्र है ग्रीष्म की आग में क्या होगा, जब तापमान नर्क की तरह दहक उठेगा? प्रशासन की यह घिनौनी उदासीनता अब विद्रोह की चिंगारी बन रही है—लोग सड़कों पर उतरेंगे और तब जिम्मेदारों के महल हिलेंगे! इंजीनियरों का गिरोह? वे तो छुट्टी पर हैं—फाइलों में दबे है, कॉफी पीते है। शिकायतें आती हैं, जवाब? खाली वादे, जैसे मीठे जहर की गोली। प्रतिभा जी का पसंदीदा बहाना फंड न मिला, मंजूरी अटकी है।” अरे बहन, क्या जन-जीवन का संकट भी फाइलों की फौज में दफन हो गया? चुनी गईं तो क्रांति लाने, न कि रोने-धोने का धंधा चमकाने! यह निष्क्रियता नहीं, अपराध है—मौन की साजिश, जहां हर बूंद का अपमान हो रहा।

“जल अधिकार है, दान नहीं—पालिका का कर्तव्य है, उपेक्षा नहीं!” बालोदवासी अब चुप नहीं रहेंगे। महिलाओं का आंदोलन उफान मार रहा—टैक्स लूटा जा रहा, कर वसूला जा रहा, लेकिन बदले में? शून्यता का सागर! पाइप फटे पड़े, रिसाव से नदियां बह रही, टैंक सूखे पड़े। करोड़ों की ‘योजनाएं’ दिखाई गईं—कहां गये वे धन? जेबें भर लीं, या विदेशी दौरे? यह सवाल अब तीर बन चुके—सीधे भ्रष्टाचार के सीने में! यदि यह सिलसिला न रुका, तो बालोद की जल-नीति इतिहास की काली दाग बनेगी—अक्षमता का प्रतीक, नेतृत्व की लाचारी का प्रमाण। जनता सुलग रही, क्रोध का ज्वालामुखी फूटने को है। प्रतिभा चौधरी, जागो! या फिर कुर्सी से उतर जाओ—क्योंकि प्यासे मुंह से अब गालियां ही निकलेंगी, आशीर्वाद नहीं। बालोद का जल-युद्ध जीतना है तो लड़ो, अन्यथा इतिहास तुम्हें थूक देगा!

पूर्व पार्षद एवं सभा पति योग राज भारती का वर्जन:

“मैं लंबे समय से जनता के बीच रहा हूँ और पानी की इस हालत को ना तो मैं सहन कर सकता हूँ और ना ही सहूँगा। वार्डवार शिकायतें हैं—सभी लोग बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हैं। मैंने पालिका और संबंधित अधिकारियों को पत्र दिए हैं, पर कार्रवाई न के बराबर हुई।

जल पूर्ति विभाग का वर्जन:

“बालोद जल पूर्ति विभाग का मानना है कि विभाग जनता को नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए निरन्तर प्रयासरत है। हाल के दिनों में पाइपलाइन के कुछ हिस्सों में तकनीकी खराबी और बिजली आपूर्ति में अनियमितता के कारण आपूर्ति प्रभावित रही—जिसके निवारण के लिए टीमों को सक्रिय कर दिया गया है।

सामाजिक कार्यकर्ता राजेश चोपड़ा का वर्जन:

“यह सिर्फ समस्या नहीं, यह एक सामाजिक अपराध है—जब जनता का अधिकार (पेयजल) ही राजनीतिक या प्रशासनिक बहानों में गुम होता दिखे। मैंने कई वार्डों का दौरा किया है, और स्थिति देखने के बाद कहना पड़ता है कि यह ‘व्यवस्था की धृष्टता’ है। जिम्मेदारों को चाहिए कि वे ठोस समयसीमा तय कर तत्काल पानी की व्यवस्था करें

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