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जितेंद्र गजेन्द्र पर शिक्षक संहिता की धारा 5(1), 7(3) और 9(2) के उल्लंघन सरेखा स्कूल का है मामला 

जितेंद्र गजेन्द्र पर शिक्षक संहिता की धारा 5(1), 7(3) और 9(2) के उल्लंघन सरेखा स्कूल का हैं मामला 

जितेंद्र गजेन्द्र पर शिक्षक संहिता की धारा 5(1), 7(3) और 9(2) के उल्लंघन सरेखा स्कूल का हैं मामला

बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के शिक्षा विभाग में पारदर्शिता और अनुशासन की धज्जियाँ उड़ाने वाला मामला सामने आया है। विकासखंड गुण्डरदेही के पूर्व माध्यमिक विद्यालय सरेखा में हेडमास्टर का पद कागजों पर तो भरा हुआ है पर वास्तविकता में विद्यालय बिना नेतृत्व के चल रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद के अनुसार, जितेंद्र गजेन्द्र, जो पूर्व में बीआरसीसी बालोद के पद पर कार्यरत थे उनका मूल पद सरेखा विद्यालय का है और उनका वेतन वहीं से आहरण होता है। हाल के ट्रांसफर सूची में पहले तो उनका नाम सरेखा विद्यालय के अंतर्गत था, पर संशोधित सूची में जिला शिक्षा अधिकारी बालोद के विकल्प पर दर्शा दिया गया, जिससे न केवल नियमों की अवहेलना हुई बल्कि प्रशासनिक अस्पष्टता और गहरी हो गई।

*शिक्षक संहिता का उल्लंघन*

छत्तीसगढ़ शिक्षक संहिता की धारा 5(1) के अनुसार, “कोई भी शिक्षक या शैक्षणिक अधिकारी अपने मूल पद से असंबद्ध होकर अन्य पद पर स्थायी रूप से कार्य नहीं कर सकता।वहीं धारा 7(3) स्पष्ट करती है कि “किसी भी शिक्षक का वेतन उसी संस्था से आहरण होगा जहाँ वह वास्तविक रूप से सेवा प्रदान कर रहा हो।इसके अतिरिक्त धारा 9(2) में कहा गया है कि “यदि किसी पद पर वास्तविक रूप से कार्यरत व्यक्ति उपलब्ध न हो तो विभाग को तात्कालिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।इन सभी धाराओं का उल्लंघन इस मामले में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विद्यालय का पद कागजों में भरा हुआ दिखाया जा रहा है, जिससे सरेखा के बच्चों को वास्तविक प्रधानाध्यापक का मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है।

*ग्रामीणों की आवाज़ अनसुनी*

सरेखा ग्राम के नागरिक कई बार कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन देकर इस अनियमितता की शिकायत कर चुके हैं, किंतु अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) का प्रभाव जारी रहेगा, विभागीय कार्रवाई ठप रहेगी।

डीईओ कार्यालय पर सवाल

जिला शिक्षा अधिकारी बालोद मधुलिका तिवारी के नेतृत्व में विभागीय चुप्पी भी गंभीर सवाल खड़े करती है। शिक्षक संहिता की धारा 12(1) के अंतर्गत “विभागीय नियंत्रण अधिकारी पर यह दायित्व है कि वह प्रत्येक शिक्षक की पदस्थापना, कार्य और अनुशासन की समीक्षा करे”, लेकिन इस मामले में कोई ठोस निरीक्षण नहीं हुआ।यह मामला केवल एक विद्यालय की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा प्रशासन में व्याप्त लापरवाही और पारदर्शिता की कमी का प्रतीक है। शिक्षक संहिता की बार-बार अनदेखी यह दर्शाती है कि शिक्षा विभाग के भीतर नियमों से ज़्यादा रिश्ते प्रभावी हैं। जब तक शासन स्तर से इस पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक ग्रामीणों और विद्यार्थियों का शैक्षणिक भविष्य अधर में रहेगा।

सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद ने कहा कि यह पूरा खेल जिला शिक्षा अधिकारी के द्वारा खेला जा रहा है वैसे ये जहां भी जाती है वहां एक अलग ही कारनामा को अंजाम देती है।

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