हमर छत्तीसगढ़

शिक्षक मेन सिंह साहू द्वारा आदेशों की धज्जियाँ उड़ाने पर अधिकारी भी संदिग्ध

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में प्राथमिक शाला कोड़ेवा से जुड़ा प्रकरण शिक्षा विभाग की जड़ता, उदासीनता और प्रशासनिक चरित्रहीनता का नग्न उदाहरण बन चुका है। ग्रामीणों की बार-बार की गई शिकायतों के बावजूद प्रधान पाठक मेन सिंह साहू की वास्तविक उपस्थिति पर कोई निर्णायक कदम न उठाना, पूरे विभाग की नीयत पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कागजों में उन्हें प्राथमिक शाला अर्जुनी भेजने का दावा किया गया, मगर वास्तविकता यह है कि न तो उन्हें कोड़ेवा से विधिवत मुक्त किया गया और न ही संकुल केंद्र कोटगांव में उनकी सक्रिय भूमिका पर रोक लगाई गई। यह स्थिति प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि खुली प्रशासनिक विफलता है।शिक्षा विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी पारदर्शिता, अनुशासन और जनहित है, लेकिन यहाँ अधिकारियों की उदासीनता इतने चरम पर पहुँच गई है कि आदेशों का पालन करना भी उन्हें बोझ प्रतीत होता है। सवाल यह है कि जब किसी शिक्षक को दोहरी जगह पर प्रभावी रूप से सक्रिय रहने दिया जाता है, तब विभाग का पूरा तंत्र किसके संरक्षण में ऐसे नियमविहीन हालात पैदा कर रहा है? यह न केवल सेवा नियमों की अवहेलना है, बल्कि शासन की साख को चोट पहुँचाने वाला गंभीर दुराचार है।छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम 1965 में स्पष्ट रूप से अधिकारी और कर्मचारी दोनों को समयबद्ध आदेश पालन, सत्यनिष्ठा और अनुशासन का पालन करने के लिए बाध्य करता है। आदेश लागू न करना सीधे-सीधे धारा 3(1) का उल्लंघन है, फिर भी विभागीय अधिकारी अजीबोगरीब चुप्पी ओढ़कर बैठे हैं। ऐसा लगता है जैसे विभाग के भीतर एक ऐसा गठजोड़ सक्रिय है, जो नियमों को कुचलकर मनमानी को ही अधिकार मान चुका है।ग्रामीणों की शिकायतों को उपेक्षित कर देना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अपमान है। बच्चे अव्यवस्था झेल रहे हैं, विद्यालय की शिक्षण प्रक्रिया बाधित है, और संकुल संचालन में अनियमितताएँ बढ़ रही हैं—इसके बावजूद शिक्षा विभाग की आँखें बंद हैं। यह संवेदनहीनता, लापरवाही और भ्रष्ट मानसिकता का मिश्रित स्वरूप है, जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।अब समय आ गया है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जाँच कराई जाए और उन सभी जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई हो, जिन्होंने आदेश को अमल में न लाकर शिक्षा व्यवस्था को मज़ाक बना दिया। यदि शासन इस पर अंकुश नहीं लगाता, तो यह चूक नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ किया गया आपराधिक खिलवाड़ माना जाएगा।शिक्षा विभाग को यह समझना होगा कि आदेश सिर्फ कागज नहीं, जिम्मेदारी की रीढ़ होते हैं—और इस रीढ़ को तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं।

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