हमर छत्तीसगढ़

“तांदुला नदी का गला घोंटते रेत माफिया—और बालोद खनिज विभाग की घोर चुप्पी!”

बालोद:- छत्तीसगढ़ में जिला बालोद की तांदुला नदी आज कराह रही है। यह कराह किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि मानव निर्मित लालच की है—और इस लालच के सामने प्रशासन की लाचार चुप्पी उतनी ही खतरनाक है जितना अवैध उत्खनन का क्रूर नंगा नाच। रायल्टी जमा कर दी, बस इतना काफी है—यह सोचकर रेत माफिया जिस तरह खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं, वह जिले के शासन ढांचे की भयावह तस्वीर पेश करता है।रात के अंधेरे में गर्जते ओवरलोड ट्रक, नदी की छाती चीरती भारी मशीनें, अस्थायी पुलों पर दौड़ते टनों वजनी वाहन—सभी यह बताने के लिए काफी हैं कि एनजीटी के दिशा-निर्देश बालोद में कागज़ पर ही दम तोड़ चुके हैं। तांदुला की रेत छीनी जा रही है, तट कट रहे हैं, पुल गिर रहे हैं—और प्रशासन मानो कोई खोया हुआ दर्शक है, जो देख तो रहा है पर बोलने का साहस खो चुका है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिले की खनिज अधिकारी मीनाक्षी साहू के नेतृत्व वाला विभाग आखिर कौन-सा ‘अदृश्य पर्दा’ ओढ़कर बैठा है, जिसके पीछे अवैध खनन की चीख भी सुनाई नहीं देती? नदी से उठती धूल, पुलों की दरारें, हाईवा का कहर—सब कुछ स्पष्ट है। अस्पष्ट सिर्फ विभाग की नीयत है। कार्रवाई के नाम पर कभी–कभार वाहनों को रोकना और बाद में “सेटिंग” की चिर-परिचित सुगंध का फैलना पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करता है।यह खेल महज रेत का नहीं—यह भविष्य की हत्या है। नदी तट का विनाश केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं, बल्कि समाज की रीढ़ पर चोट है। और जो अधिकारी, प्रतिनिधि व तथाकथित समाजसेवी मंचों पर पर्यावरण की रक्षा की कसम खाते हैं, वही नियमों को रौंदकर लाभ कमाते मिलें—यह पाखंड किसी महामारी से कम नहीं।बालोद की जनता अब भ्रमित नहीं। लोग सब देख रहे हैं—कि तंदुला की हत्या पर सबसे बड़ा अपराधी वही है जो खनन करता है, और उससे बड़ा वह है जो खनन को रोकने का अधिकार रखते हुए भी आंखें फेर लेता है।अब वक्त है कि जनता के सवाल का आखिर भूरा सोना के चोर कब तक तांदुला मैया के सीना चीर कर तड़तड़पा के नेस्तनाबूद करेंगे“तांदुला की बर्बादी का मूक साक्षी क्यों बना है खनिज विभाग? यह मौन कब टूटेगा?”अगर इस चेतावनी को भी अनसुना किया गया, तो अगली पीढ़ियाँ नदियों के इतिहास पढ़ेंगी—नदियाँ नहीं।

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