डौंडीलोहारा में पत्रकारों की खामोश हुंकार: जब कलम ने अत्याचार के खिलाफ बिगुल बजाया

जब कलम ने खामोशी को हथियार बनाया
बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के आदिवासी अंचल डौंडीलोहारा में आज वह दृश्य देखने को मिला, जिसकी उम्मीद शायद किसी ने नहीं की थी। जिन पत्रकारों की कलम ने सदैव जनहित, समस्याओं और प्रशासनिक अनियमितताओं को आईने की तरह साफ दिखाया है—आज वही पत्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई न होने पर सड़क पर उतरे, वह भी मौन-जुलूस के रूप में।पत्रकारों ने साफ कहा कि अब शासन-प्रशासन खबरों की संवेदनशीलता से ज़्यादा भ्रष्टाचार को महत्व देने लगा है। यही कारण है कि ठोस सबूतों और दस्तावेज़ों के साथ किए गए खुलासों पर भी कार्रवाई न होना प्रशासनिक उदासीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब न्याय की उम्मीद टूटने लगे, और सच्चाई को दबाने की कोशिश हो, तब पत्रकारों का यह मौन—दरअसल लोकतंत्र की आवाज़ है, जो खामोश होकर भी सबसे तेज़ गूंजती है।डौंडीलोहारा में निकला यह जुलूस केवल पत्रकारों का नहीं था, बल्कि समाज की हर संवेदनशील आवाज़ का प्रतिनिधित्व कर रहा था। सामाजिक संगठनों से लेकर राजनीतिक, गैर-राजनीतिक इकाइयों तक—सभी ने इसमें अपना समर्थन दिया।इस मौन आंदोलन में प्रमुख रूप से शामिल रहे—ओबीसी महासभा के यज्ञ देव पटेल,साहित्यकार डॉ. अशोक आकाश,
सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष डॉ. तुकाराम कोर्राम,प्रेस रिपोर्टर क्लब के प्रदेश अध्यक्ष संजय सोनी,
और रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजू गुप्ता, शशिकांत देवांगन, दुर्ग से गोपाल निर्मलकर, तथा अनेक स्थानीय जिला स्तरीय पत्रकार।
स्थानीय पत्रकारों ने स्पष्ट कहा—
“भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई आज ही नहीं, हमेशा जारी रहेगी।”
यह आंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि चेतावनी है—
कि यदि ईमानदार पत्रकारिता को दबाने की कोशिश हुई, तो कलम अपनी स्याही नहीं, अपनी खामोशी से भी सच्चाई का इतिहास लिखने की क्षमता रखती है।डौंडीलोहारा का यह मौन-जुलूस बताता है कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत दीवार मीडिया है, और जब यही दीवार सत्ता की अनदेखी से दरकने लगे, तो जनता की सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है।आज पत्रकारों ने अपने मौन में वह आग छुपा रखी थी, जो भ्रष्टाचार की हर दीवार को राख कर सकती है। यह सिर्फ आंदोलन नहीं, बल्कि संदेश है—सत्य को अगर रोका गया, तो उसकी गूंज और भी बुलंद होकर लौटेगी।



