जगन्नाथपुर सांकरा में रात की परछाइयों में लकड़ी माफिया का खेल बालोद प्रशासन कब जागेगा?

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में गैर-इमारती लकड़ी विशेषकर कहुआ की अवैध तस्करी लगातार पंख फैलाती जा रही है। कानून की मौजूदगी के बावजूद तस्करों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे पकड़ में आने के बाद भी बच निकलने का रास्ता खोज लेते हैं। ताज़ा मामला जगन्नाथपुर सांकरा बांध क्षेत्र का है जिसने वन विभाग, जिला प्रशासन और राजस्व विभाग—इन तीनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।वन विभाग की टीम ने रात करीब 9 बजे कहुआ लकड़ी से भरी एक ट्रैक्टर–ट्रॉली जब्त की। नियम के अनुसार जब्त वाहन और सामग्री को तुरंत सुरक्षित स्थान—प्रमुख रूप से वन चौकी या वन विभाग के सुरक्षित परिसर—में ले जाना चाहिए। परंतु हैरानी की बात है कि टीम ने ट्रॉली को वहीं खड़ा छोड़ दिया और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल कोटवार पर डालकर वापस लौट गई। कोटवार उत्तम का कहना है कि वह रात में भोजन करने घर गया था, और उसी दौरान तस्कर ट्रॉली ले भागा, जबकि लकड़ी को वहीं छोड़ गया। अब बड़ा सवाल यह है—क्या एक कोटवार से रात के अंधेरे में माफियाओं से मुकाबला करने की अपेक्षा की जा सकती है?यह घटना सिर्फ ‘लापरवाही’ नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी का गंभीर हनन है। जब्ती की कार्रवाई के बाद सुरक्षा सुनिश्चित करना वन विभाग की कानूनी जिम्मेदारी है। यदि विभाग यह दावा करता है कि उनके पास ट्रॉली को सुरक्षित स्थान ले जाने हेतु ट्रैक्टर उपलब्ध नहीं था, तो यह विभाग की संसाधन क्षमता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है। और यदि संसाधन थे, पर उपयोग नहीं किया गया—तो यह मिलीभगत की आशंका को बल देता है।इसी कड़ी में राजस्व विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है। क्षेत्र में लंबे समय से चल रही लकड़ी तस्करी पर राजस्व अमले की चुप्पी, विवादित सीमांकन, वन भूमि पर नजर रखने की जिम्मेदारी और स्थानीय स्तर पर मिलने वाली संरक्षण छत्रछाया—इन सबने मिलकर लकड़ी माफिया को सुरक्षित वातावरण दिया है। जब जिस विभाग की जिम्मेदारी राजस्व नियंत्रण और भूमि निगरानी हो, वही विभाग माफिया के लिए ढाल बन जाए, तो फिर तस्करों के हौसले क्यों न बढ़ें?आखिर तस्कर को कैसे पता चला कि ट्रॉली कब और किस समय असुरक्षित है? क्या यह महज संयोग है, या विभागीय अमलों से ही सूचना लीक हुई? राजस्व और वन विभाग दोनों पर यह संदेह इसलिए गहरा है क्योंकि क्षेत्र में पिछले कई महीनों से तस्करी की घटनाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन न कार्रवाई होती है, न ही कोई ठोस रोकथाम।जिला प्रशासन, वन विभाग और राजस्व विभाग—तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि जब्त सामग्री, वाहन और साक्ष्यों को सुरक्षित रखें ताकि आगे की कानूनी प्रक्रिया मजबूत हो सके। लेकिन जब्ती के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रॉली का गायब होना पूरे प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में खड़ा करता है। तस्कर अगर विभागों को चकमा देकर जब्त वाहन ले जा सकते हैं, तो यह सुरक्षा व्यवस्था और विभागीय ईमानदारी दोनों पर भारी प्रश्नचिह्न है।
अब आवश्यक है कि जिला प्रशासन उच्चस्तरीय जांच कराए और निम्न बिंदुओं पर जवाबदेही तय करे—
1. जब्ती के बाद वाहन को सुरक्षित स्थान पर क्यों नहीं ले जाया गया?
2. ट्रॉली की सुरक्षा एक अकेले कोटवार पर क्यों छोड़ी गई?
3. तस्करों को कब और कैसे जानकारी मिली?
4. क्या वन विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत की संभावना है?
5. राजस्व विभाग ने क्षेत्र में बढ़ती तस्करी रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए?
बालोद जिले के लोग यह जानने का हक रखते हैं कि प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिए जिम्मेदार विभाग अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभा भी रहे हैं या नहीं। यदि इस मामले में कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो तस्करों के हौसले और बढ़ेंगे और जंगलों की लूट और भी तेज होगी।अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन, वन विभाग और राजस्व विभाग तीनों जागें—तस्करी पर लगाम कसें, मिलीभगत पर चोट करें और जिम्मेदारी तय करें—वरना यह अवैध खेल जंगलों के साथ-साथ पूरी व्यवस्था को अंदर से खोखला कर देगा।



