नन्ही आवाज़ों की ताकत सूअरबोड़ में जब बेटियों की पुकार ने टूटते मन को संभाल लिया

रिपोर्टर :- दिनेश कुमार नेताम
बालोद :- कहते हैं कि ईश्वर बच्चों के स्वरूप में धरती पर उतरते हैं। उनकी आवाज़ में वह शक्ति होती है, जो पत्थर दिल को भी पिघला दे और बिखरते मन को फिर से जोड़ दे। छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के डौण्डी विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सूअरबोड़ में घटित एक हृदयस्पर्शी घटना ने इस कहावत को जीवंत कर दिया जहाँ एक मानसिक रूप से असंतुलित पिता को उसकी ही मासूम बेटियों की करुण पुकार ने जीवन की ओर लौटा दिया।
घटना रविवार सुबह की है। ग्राम सूअरबोड़ के कोर्राम परिवार से जुड़े लमसेना (दामाद) पूना राम मंडावी, जिनकी मानसिक स्थिति हाल के दिनों में अचानक बिगड़ गई थी, सुबह करीब सात बजे गांव में जल जीवन मिशन के तहत बनी नई पानी टंकी पर चढ़ गए। ऊँचाई पर खड़े व्यक्ति को देख ग्रामीणों के दिल दहल उठे। अनहोनी की आशंका ने पूरे गांव को चिंता में डाल दिया। परिवारजन बदहवास थे और ग्रामीण किसी भी तरह का जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे।स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल पुलिस प्रशासन और दमकल विभाग को सूचना दी गई। कुछ ही समय में पुलिस बल और दमकल कर्मियों की टीम मौके पर पहुँची। सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई, आसपास के क्षेत्र को नियंत्रित किया गया और पूना राम से संवाद स्थापित करने की कोशिश शुरू हुई। लेकिन मानसिक संतुलन बिगड़े होने के कारण वह किसी की बात सुनने या समझने की स्थिति में नहीं थे। हर बीतता पल तनाव बढ़ा रहा था।
करीब पाँच घंटे तक पुलिस, दमकल कर्मी, ग्रामीण और परिवारजन मिलकर प्रयास करते रहे। समझाइश, अपील, भरोसा—हर तरीका अपनाया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। तभी सूझबूझ और मानवीय संवेदना से भरा एक निर्णय लिया गया, जिसने पूरे घटनाक्रम की दिशा ही बदल दी। पूना राम की मासूम बेटियों को बुलाया गया और उनसे अपने पिता को आवाज़ देने के लिए कहा गया।जैसे ही बेटियों ने काँपती आवाज़ में “पापा… नीचे आ जाइए” कहा, वातावरण में एक अजीब सी शांति छा गई। वह पुकार किसी आदेश की तरह नहीं, बल्कि प्रेम और भरोसे की डोर थी। मानो वह आवाज़ सीधे उनके हृदय तक पहुँची। कुछ क्षणों के लिए सब थम सा गया। फिर एक चमत्कार हुआ—जिस व्यक्ति को कोई समझा नहीं पा रहा था, वह खुद धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।जब पूना राम सुरक्षित नीचे आए, तो वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखों में राहत और भावुकता साफ झलक रही थी। परिवारजनों ने चैन की साँस ली, ग्रामीणों ने ईश्वर को धन्यवाद दिया और पुलिस-दमकल कर्मियों के चेहरे पर भी संतोष दिखाई दिया। यह केवल एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं था, बल्कि मानवीय रिश्तों की जीत थी।यह घटना समाज के लिए एक मिसाल बन गई—कि तकनीक, ताकत और व्यवस्था से पहले कभी-कभी मासूमियत और प्रेम सबसे बड़ा हथियार बन जाते हैं। नन्ही बेटियों की करुण पुकार ने यह साबित कर दिया कि संवेदना से बड़ा कोई उपाय नहीं, और बच्चों की आवाज़ में सचमुच ईश्वर बसता है।



