धान के ढेर पर बैठा सिस्टम, बेबस किसान — गुजरा उपार्जन केंद्र में अव्यवस्था का विस्फोट

रिपोर्टर :- दिनेश कुमार नेताम
बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में डौंडी विकासखंड के आदिवासी अंचल में ग्राम पंचायत गुजरा धान उपार्जन केंद्र की वर्तमान स्थिति ने यह साफ कर दिया है कि व्यवस्था और ज़मीन की हकीकत के बीच की दूरी खतरनाक स्तर तक बढ़ चुकी है। खेतों से सुनहरी फसल लेकर आए किसान आज उपार्जन केंद्रों में असहाय खड़े हैं, जहां न समय की कोई कद्र है, न मेहनत की कोई कीमत। धान खरीदी का दावा तो है, लेकिन उठाव की रफ्तार इतनी धीमी है कि पूरा तंत्र किसानों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।
धान खरीदी शुरू हुए डेढ़ माह से अधिक का समय बीत चुका है, इसके बावजूद गुजरा उपार्जन केंद्र में हजारों क्विंटल धान जमा पड़ा है। किसानों की सुविधा के नाम पर प्रतिदिन खरीदी की सीमा बढ़ा दी गई, मगर उसके अनुरूप उठाव की कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई। नतीजा यह हुआ कि उपार्जन केंद्रों में जगह कम पड़ गई और किसानों को घंटों नहीं, बल्कि पूरा दिन इंतजार करना पड़ रहा है।
यह केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे आर्थिक नुकसान का कारण बन रहा है। किसान खेत, घर और रोजमर्रा के काम छोड़कर धान बेचने आता है, लेकिन जब पूरा दिन लाइन में गुजर जाए तो उसकी मजदूरी, खेती की तैयारी और परिवार की जिम्मेदारियां सब प्रभावित होती हैं। ऊपर से धान खुले में पड़ा है, जहां नमी, मौसम और खराब प्रबंधन के कारण गुणवत्ता गिरने का खतरा लगातार बना हुआ है। अगर धान खराब हुआ तो कटौती का दंड भी किसान को ही भुगतना पड़ेगा।गुजरा के साथ-साथ आसपास के गांवों—खलारी, सूअरबोड़, भैंसबोड़, बोरीद, दानिटोला, बनगांव और अडजाल—के किसान इस अव्यवस्था की चपेट में हैं। किसानों का साफ कहना है कि समस्या धान की आवक की नहीं, बल्कि उठाव और प्रबंधन की नाकामी की है। मिलर्स द्वारा कस्टम मिलिंग में की जा रही देरी ने हालात को और बिगाड़ दिया है। धान खरीदा जा रहा है, लेकिन गोदामों से बाहर नहीं जा रहा—यह विरोधाभास पूरे सिस्टम की पोल खोलता है।सबसे गंभीर बात यह है कि यदि यही हालात बने रहे, तो उपार्जन केंद्रों में खरीदी ही बाधित हो सकती है। इसका सीधा असर किसानों के भुगतान पर पड़ेगा। समय पर पैसा न मिलने से कर्ज चुकाने में देरी, बीज-खाद की व्यवस्था में बाधा और पारिवारिक खर्चों पर संकट खड़ा हो जाएगा। यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला है।इस पूरी स्थिति का उद्देश्य अब केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि चेतावनी देना है। यदि धान उठाव के लिए तुरंत अतिरिक्त वाहन, पर्याप्त भंडारण और मिलर्स पर सख्त निगरानी लागू नहीं की गई, तो यह संकट और गहरा जाएगा। किसान अब केवल खरीदी नहीं, सम्मानजनक और समयबद्ध व्यवस्था चाहता है।अन्न पैदा करने वाला किसान आज सवाल पूछ रहा है—क्या उसकी मेहनत सिर्फ आंकड़ों तक सीमित है? अगर जवाब समय रहते नहीं मिला, तो यह असंतोष आने वाले दिनों में बड़े आंदोलन का रूप भी ले सकता है। अब निर्णय शासन और प्रशासन के हाथ में है—व्यवस्था सुधारें या फिर इस अव्यवस्था की जिम्मेदारी स्वीकार करें।



