हमर छत्तीसगढ़

नगर पंचायत पलारी में सड़क नहीं, सवालों की लंबी लकीर — 500 मीटर स्वीकृति, 300 मीटर निर्माण और 200 मीटर का भ्रष्टाचार

 

रिपोर्टर:- रिखी साहू

बालोद/पलारी:-छत्तीसगढ़ के बालोद जिले अंतर्गत नगर पंचायत पलारी में शीतला माता मंदिर से चतुर घर तक प्रस्तावित सड़क निर्माण आज विकास की मिसाल नहीं, बल्कि भ्रष्ट व्यवस्था का बदनुमा चेहरा बनकर सामने आया है। पाँच लाख रुपये की स्वीकृत लागत, 500 मीटर लंबाई का स्पष्ट प्रावधान और जनता की उम्मीद—इन सबको ताक पर रखकर केवल 300 मीटर सड़क बनाकर 200 मीटर की राशि हजम कर ली गई, ऐसा स्थानीय नागरिकों का गंभीर आरोप है।सवाल यह नहीं कि सड़क बनी या नहीं, सवाल यह है कि जो बननी थी वह पूरी क्यों नहीं बनी, और जो बनी ही नहीं, उसका भुगतान किस आधार पर कर दिया गया? यदि कार्यादेश स्पष्ट रूप से 500 मीटर का था, तो 300 मीटर पर काम रोककर शेष राशि कैसे निकाली गई? माप पुस्तिका में क्या दर्ज किया गया? तकनीकी स्वीकृति किसने दी और स्थल निरीक्षण कब हुआ? क्या बिना भौतिक सत्यापन के ही बिल पास कर दिए गए? ये प्रश्न केवल कागजी नहीं, बल्कि जनहित की जड़ों से जुड़े हुए हैं।
यह प्रकरण ठेकेदार की कथित मिलीभगत, मुख्य नगर पंचायत अधिकारी की संदिग्ध भूमिका और जिला प्रशासन की चुप्पी पर करारा तमाचा है। उद्देश्य सड़क निर्माण से अधिक धन निकासी प्रतीत होता है। जहाँ सड़क बनी भी है, वहाँ निर्माण गुणवत्ता गंभीर संदेह के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क में घटिया सामग्री का उपयोग किया गया है—मिट्टी मिश्रित गिट्टी, कमजोर बेस और निर्धारित मोटाई का अभाव साफ दिखाई देता है। कुछ ही समय में सड़क पर दरारें और उखड़ने के संकेत इस बात की पुष्टि करते हैं कि गुणवत्ता से खुला समझौता किया गया है।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौके पर सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया। न तो कार्य की लागत, न लंबाई, न ठेकेदार का नाम, न ही स्वीकृति वर्ष या योजना का उल्लेख—जो कि शासकीय नियमों के तहत अनिवार्य होता है। सूचना बोर्ड का न होना इस संदेह को और गहरा करता है कि पूरी प्रक्रिया जानबूझकर अपारदर्शी रखी गई, ताकि सवाल उठने से पहले ही भुगतान निकाल लिया जाए।
जनता पूछ रही है कि जब मंदिर से चतुर घर तक पूरा मार्ग स्वीकृत था, तो बीच में विकास क्यों दम तोड़ गया? क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की आंखों पर सुविधा की पट्टी बंधी थी, या फिर सब कुछ जानते-बूझते अनदेखा किया गया? ठेकेदार पर आरोप है कि उसने कार्यादेश की मर्यादा तोड़ी, माप में खेल किया और भुगतान का लाभ उठाया। वहीं मुख्य नगर पंचायत अधिकारी से जवाबदेही तय होनी चाहिए कि उन्होंने कार्य प्रगति की निगरानी कैसे की और अपूर्ण व घटिया कार्य पर पूर्ण भुगतान क्यों होने दिया।जिला प्रशासन की जिम्मेदारी इससे भी बड़ी है। यदि शिकायतों और जनआक्रोश के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ती, तो यह चुप्पी नहीं बल्कि मौन सहमति मानी जाएगी। यह मामला केवल 200 मीटर सड़क का नहीं, बल्कि व्यवस्था की उन 200 परतों का है जिनके पीछे भ्रष्टाचार सुरक्षित रहता है।जनता की स्पष्ट मांग है कि स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से स्थल मापन कराया जाए, सूचना बोर्ड न लगाने और खराब सामग्री उपयोग की जांच हो, अपूर्ण कार्य की राशि की तत्काल रिकवरी की जाए, दोषी ठेकेदार व अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई हो और पूरे प्रकरण की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।विकास के नाम पर धोखा अब स्वीकार्य नहीं। मंदिर की राह पर बना यह अधूरा और संदिग्ध मार्ग प्रशासन के अधूरे दायित्व का प्रतीक बन चुका है। यदि अब भी जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह सवाल सड़क से उठकर सदन तक जाएगा—क्योंकि जनता अब हिसाब मांग रही है, और इस बार चुप्पी का कोई बहाना नहीं चलेगा।

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