हेडिंग:- जगह बदला खेल नहीं बालोद दूध गंगा का बड़ा घोटाला हुआ उजागर

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सवाल सिर्फ अवैध डेयरी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक नैतिकता के अंतिम संस्कार का है। कोर्ट के पास बना दूध गंगा संस्थान, जिसे सरकार की सहायता मिली, वही संस्थान नियमों को रौंदते हुए रामदेव चौक में बिना अनुमति दूसरा फार्म खोल देता है। यह दुस्साहस तभी संभव है, जब व्यवस्था अंदर से खोखली हो।जब विरोध हुआ, जब सवाल उठे, तब समाधान नहीं निकाला गया केवल आश्वासन दे दिया । यह कोई सुधार नहीं, बल्कि जनता की आंखों में धूल झोंकने की निर्लज्ज कोशिश है। क्या प्रशासन इतना भोला है कि जगह बदलने को वैधानिकता मान ले? या फिर जानबूझकर सब कुछ नजरअंदाज किया जा रहा है?कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा के नेतृत्व में यदि ऐसी गतिविधियां पनप रही हैं, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है। प्रशासन का काम नियम लागू करना होता है, न कि नियम तोड़ने वालों के लिए रास्ता साफ करना। यहां तो स्थिति यह है कि सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान ही कानून का सबसे बड़ा मजाक बना हुआ है।पूरा प्रशासनिक तंत्र सवालों के घेरे में है। खाद्य सुरक्षा से लेकर नगर प्रशासन तक, हर विभाग की निष्क्रियता इस बात का संकेत देती है कि या तो जिम्मेदारी मर चुकी है या फिर मिलीभगत जिंदा है। यह कोई भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि तथ्यों से उपजा आक्रोश है।कानून का मतलब केवल गरीब और कमजोर पर कार्रवाई नहीं होता। कानून की असली परीक्षा तब होती है, जब रसूखदार और संरक्षित संस्थानों पर हाथ डाला जाए। बालोद में यह परीक्षा बार-बार टाली जा रही है। यही कारण है कि अवैध कारोबार निडर होकर फल-फूल रहा है।अब वक्त आ गया है कि जिला प्रशासन जवाब दे—अनुमति किसने दी, निरीक्षण क्यों नहीं हुआ, कार्रवाई क्यों रुकी और जगह बदलने की नौटंकी क्यों स्वीकार की गई? यदि इन सवालों का जवाब नहीं मिला, तो यह मानना पड़ेगा कि बालोद में कानून नहीं, बल्कि सुविधा आधारित शासन चल रहा है।जनता कानून की भीख नहीं मांग रही, वह अपना संवैधानिक अधिकार मांग रही है। कानून सर्वोपरि है—यह नारा नहीं, व्यवस्था की आत्मा है। यदि इसे कुचला गया, तो विरोध केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहेगा। सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद के कहा कि “जगह बदल देने से अवैध काम वैध नहीं हो जाता। दूध गंगा का सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने की कोशिश है। प्रशासन सब कुछ जानकर भी चुप है, यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर नियम सबके लिए बराबर नहीं हैं, तो फिर शासन व्यवस्था सिर्फ दिखावा बनकर रह गई है।”



