बच्चों से गोबर उठवाने का मुख्य गुनाहगार हिमांशु मिश्रा जवाबदेही से भाग रहे डौंडीलोहारा शिक्षा तंत्र

बालोद :— छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से सामने आई यह घटना सिर्फ एक स्कूल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के नैतिक पतन का आईना है। डौंडीलोहारा विकासखंड के संबलपुर प्राथमिक विद्यालय में स्कूली बच्चों से गोबर उठवाने का मामला शिक्षा व्यवस्था पर सीधा तमाचा है। यह कृत्य न केवल अमानवीय है, बल्कि बच्चों के अधिकार, सम्मान और कानून—तीनों का खुला उल्लंघन है।16 जनवरी, शुक्रवार को स्कूल की तथाकथित साफ-सफाई के नाम पर मासूम बच्चों को सड़क पार कर मैदानों से गोबर बीनने भेजा गया। बच्चे बाल्टियों में गोबर भरकर स्कूल लाते रहे और शिक्षक मूकदर्शक बने रहे। यह दृश्य किसी मध्यकालीन सोच का प्रतीक लगता है, जहां शिक्षा का अर्थ श्रम शोषण बनकर रह गया है।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि इस गंभीर मामले में स्कूल प्रशासन से लेकर शिक्षा विभाग तक जिम्मेदारी से बचता नजर आया। इस पूरे मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी हिमांशु मिश्रा की भूमिका सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। मीडिया से मिली जानकारी के बाद भी उनका “ऑन कैमरा कुछ नहीं कह पाऊंगा” कहना, प्रशासनिक संवेदनहीनता का परिचायक है। जब बच्चों के सम्मान और सुरक्षा का प्रश्न हो, तब रिपोर्ट मंगाने की औपचारिकता नहीं, बल्कि त्वरित और कठोर कार्रवाई अपेक्षित होती है। लेकिन शिक्षा अधिकारी हिमांशु मिश्रा कार्यवाही नहीं करेंगे बल्कि यह मामला भी भ्रष्टाचार का चारागाह बने बालोद जिला में अन्य लापरवाही को सिक्के के खनक में दबाया गया था वैसे ही इस मामले को रफा दफा कर दिया जाएगा जेब गरम पैसे हजम होगा जब शिक्षकों से सवाल किए गए तो किसी ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। प्रधान पाठक ने अवकाश का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया और उपस्थित शिक्षक एक-दूसरे पर दोष मढ़ते रहे। जिम्मेदारी से बचने की यह शैली सीधे-सीधे कर्तव्यहीनता की श्रेणी में आती है।यह सामूहिक चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि गलती आकस्मिक नहीं, बल्कि नियमित और सुनियोजित है।कानून स्पष्ट है। बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम 2005, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, और छत्तीसगढ़ शिक्षक आचरण संहिता के तहत बच्चों से शारीरिक श्रम करवाना दंडनीय अपराध है। शिक्षक संहिता के अनुसार यह कृत्य कर्तव्य के दुरुपयोग, बाल गरिमा के उल्लंघन और अनुशासनहीन आचरण की श्रेणी में आता है, जिसके लिए निलंबन, विभागीय जांच और सेवा से बर्खास्तगी तक का प्रावधान है। इसके अलावा, बीईओ स्तर पर निगरानी में चूक प्रशासनिक लापरवाही मानी जाती है, जिस पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिवार्य है।बच्चों के बयान यह साफ करते हैं कि यह काम हर सप्ताह कराया जाता रहा है। यानी यह कोई एक दिन की भूल नहीं, बल्कि लंबे समय से चला आ रहा अत्याचार है। सवाल यह है कि शिक्षा अधिकारी अब तक क्या देख रहे थे? निरीक्षण, निगरानी और जवाबदेही सिर्फ कागजों में क्यों सिमट गई?यह मामला केवल संबलपुर स्कूल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह शिक्षा विभाग के लिए चेतावनी है कि यदि दोषियों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह व्यवस्था खुद कटघरे में खड़ी होगी। बच्चों से गोबर उठवाने वालों पर और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर सख्त धाराओं में कार्रवाई होनी चाहिए, तभी शिक्षा का अर्थ बचेगा — वरना स्कूल सिर्फ शोषण के केंद्र बनकर रह जाएंगे।



