झरिया धोबी समाज का महासंगम 2026 सामाजिक चेतना, एकता और स्वाभिमान का ऐतिहासिक आह्वान

रिपोर्टर:- उत्तम साहू
बालोद/पलारी:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में धोबी समाज समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं होता, बल्कि वह परंपरा, संस्कार, संघर्ष और भविष्य की दिशा का जीवंत प्रतिबिंब होता है। इसी भावना को साकार रूप देने के लिए झरिया धोबी समाज वार्षिक सम्मेलन एवं विशाल महिला सम्मेलन 2026 ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से परिपूर्ण नगर पंचायत पलारी के हृदय स्थल शीतला धाम के प्रांगण में संपन्न हुआ यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण, संगठन शक्ति और आत्मसम्मान का विराट मंच बनकर उभर रहा है। यह आयोजन समाज के हर वर्ग—युवा, मातृशक्ति, बुजुर्ग और कर्मशील नागरिकों—को एक सूत्र में बांधने का प्रेरक प्रयास है।
पारस निर्मलकर सचिव युवा प्रकोष्ठ ने बताया कि इस सम्मेलन का मूल उद्देश्य समाज में बिखरी ऊर्जा को संगठित करना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना है। जब समाज संगठित होता है, तभी विकास की दिशा स्पष्ट होती है और सम्मान का मार्ग प्रशस्त होता है। यह सम्मेलन उसी जागरूकता का उद्घोष है—कि अब समय है जागने का, संगठित होने का और अपने सामूहिक भविष्य को स्वयं गढ़ने का।महिला सम्मेलन इस आयोजन की आत्मा है। समाज की उन्नति तब तक अधूरी है जब तक मातृशक्ति को समान भागीदारी और नेतृत्व का अवसर न मिले। इस मंच के माध्यम से महिलाओं को सामाजिक नेतृत्व, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और निर्णय क्षमता के केंद्र में लाने का सशक्त संदेश दिया जा रहा है। यह केवल सम्मान नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को मजबूत करने की निर्णायक पहल है।
दुर्ग जिलाध्यक्ष गोपाल निर्मलकर ने कहा कि युवाओं के लिए यह सम्मेलन प्रेरणा का शंखनाद है। शिक्षा, संस्कार, कौशल और सामाजिक उत्तरदायित्व—इन चार स्तंभों पर ही भविष्य खड़ा होता है। जब युवा अपनी पहचान, इतिहास और सामूहिक शक्ति को समझते हैं, तभी वे समाज को नई दिशा देने में सक्षम होते हैं। यह आयोजन उन्हें केवल सहभागी नहीं, बल्कि परिवर्तन का वाहक बनाने का प्रयास है।
सामाजिक समरसता, नशामुक्ति, शिक्षा विस्तार, पारिवारिक एकता और परस्पर सहयोग—ये इस सम्मेलन के मूल सामाजिक सरोकार हैं। समाज तभी मजबूत बनता है जब उसमें संवाद जीवित रहे, संस्कार सुरक्षित रहें और सहयोग की भावना सक्रिय रहे। यह सम्मेलन इन्हीं मूल्यों को पुनः जागृत करने का सशक्त अभियान है।
आज आवश्यकता केवल कार्यक्रम करने की नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण आयोजन करने की है। यह महासम्मेलन उसी सोच का परिणाम है—जहाँ मंच केवल भाषणों का नहीं, बल्कि संकल्पों का होगा; भीड़ केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि परिवर्तन की शक्ति बनेगी; और सहभागिता केवल रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण का आधार बनेगी।
आइए, हम सब इस ऐतिहासिक अवसर के सहभागी बनें।
एकता को संकल्प बनाएं, शिक्षा को शस्त्र बनाएं, संस्कार को पहचान बनाएं और समाज को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रण लें।यह सम्मेलन एक दिन का आयोजन नहीं—बल्कि आने वाले वर्षों की सामाजिक दिशा तय करने वाला जनजागरण है।



