सियनमरा पंचायत में सचिवशाही का कहर महिला सरपंच बेबस, प्रशासन मौन

संपादक:- मीनू साहू
बालोद :- छत्तीसगढ़ के त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें गांव के विकास और स्थानीय शासन में निर्णायक भूमिका देने का उद्देश्य रखा गया था, लेकिन बालोद जिले के गुंडरदेही विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सियनमरा में यह व्यवस्था कथित तौर पर सचिव की मनमानी और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। यहां की नव निर्वाचित सरपंच मंजू माहिलांग ने पंचायत सचिव अर्जुन सिंह टावरे पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे पंचायत संचालन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सरपंच का आरोप है कि पदभार ग्रहण करने के बाद उन्हें पंचायत के कार्यों की समुचित जानकारी देने के बजाय केवल औपचारिक दस्तावेजों में हस्ताक्षर करवाने का प्रयास किया गया। उनका कहना है कि सचिव नियमित रूप से पंचायत कार्यालय में उपस्थित नहीं रहते और सप्ताह में कभी-कभार अपनी सुविधा अनुसार पहुंचकर बिना जानकारी दिए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाते हैं। इससे निर्वाचित जनप्रतिनिधि की भूमिका सीमित होकर केवल हस्ताक्षर तक सिमटती दिखाई दे रही है।
मामले को और गंभीर बनाते हुए सरपंच ने आरोप लगाया कि पंचायत के सफाई कर्मचारी को कार्यालयीन कार्यों में लगाया गया है। ग्रामीणों से प्राप्त आवेदनों तथा अन्य दस्तावेजों पर कथित रूप से पंचायत की सील लगाने और हस्ताक्षर करने जैसे कार्य भी उसी के माध्यम से कराए जा रहे हैं। यदि यह आरोप सही हैं तो यह प्रशासनिक नियमों और जिम्मेदारियों का खुला उल्लंघन माना जाएगा।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि महिला सरपंच स्वयं को असहाय और प्रताड़ित महसूस कर रही हैं। उन्होंने बताया कि पंचायत संचालन में सहयोग मिलने के बजाय लगातार उपेक्षा और दबाव का सामना करना पड़ रहा है। अपनी पीड़ा व्यक्त करते समय उनकी भावुकता यह संकेत देती है कि मामला केवल प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के सम्मान और अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।
हैरानी की बात यह है कि पंचायत स्तर पर । यदि किसी पंचायत में सचिव ही व्यवस्था का केंद्र बन जाए और निर्वाचित प्रतिनिधि हाशिये पर धकेल दिए जाएं, तो यह स्थानीय स्वशासन की मूल भावना पर सीधा प्रहार है।
इस संबंध में सचिव अर्जुन सिंह टावरे का पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर प्रशासन कब जागेगा और पंचायत व्यवस्था को कथित सचिवशाही के शिकंजे से मुक्त कराने के लिए क्या कदम उठाएगा? ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों को अब निष्पक्ष जांच तथा जवाबदेही तय होने का इंतजार है।



