बारूद के साए में ढौर! पुरानी खदानों का हिसाब अधूरा, फिर नई खुदाई की तैयारी…
आखिर किसके इशारे पर बढ़ रहा खनन?

संपादक :- मीनू साहू
दुर्ग।:- दुर्ग जिले की अति संवेदनशील ग्राम पंचायत ढौर एक बार फिर खनन गतिविधियों को लेकर चर्चा में है। क्षेत्र में पहले से संचालित अनेक पत्थर खदानों और क्रेशरों के बीच अब एक नई पत्थर खदान के प्रस्ताव की चर्चा ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब वर्तमान खनन से जुड़ी शिकायतों का समाधान अब तक नहीं हुआ, तब नई खदान की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, क्षेत्र में नियमित रूप से होने वाले बारूद के विस्फोटों से मकानों में दरारें आने, धूल प्रदूषण बढ़ने और शोर के कारण जनजीवन प्रभावित होने जैसी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। उनका दावा है कि खेती-किसानी और दैनिक जीवन भी इससे प्रभावित हो रहा है। ऐसे में एक और खदान की संभावना ने लोगों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
प्रदेश उपाध्यक्ष, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के गुरु केवल प्रकाश साहब ने कहा कि यदि किसी नए खनन प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है, तो सबसे पहले मौजूदा खदानों के पर्यावरणीय प्रभाव, सुरक्षा मानकों और स्थानीय लोगों की शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए। उनका कहना है कि प्रभावित ग्रामीणों की सहमति और जनसुनवाई की प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ होना आवश्यक है।
सामाजिक कार्यकर्ता अश्वनी डड़सेना ने कहा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि यदि ग्रामीणों की आपत्तियों और स्थानीय परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन किए बिना निर्णय लिए जाते हैं, तो इससे लोगों में असंतोष बढ़ सकता है। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की।
ग्राम के उप सरपंच श्यामू यादव ने कहा कि ढौर पहले से ही खनन गतिविधियों के दबाव का सामना कर रहा है। उनका कहना है कि किसी भी नई स्वीकृति से पहले प्रभावित क्षेत्र का भौतिक निरीक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन और ग्रामीणों की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि गांव के लोगों की सुरक्षा और हित सर्वोपरि होने चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी प्रस्ताव को मंजूरी देने से पहले प्रभावित लोगों की आपत्तियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो इससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठेंगे। उनका आरोप है कि विकास के नाम पर ग्रामीण क्षेत्र में लगातार खनन का विस्तार किया जा रहा है, जबकि पुराने मामलों से जुड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान अभी तक नहीं हो सका है।
अब निगाहें संबंधित विभागों और प्रशासन पर टिकी हैं। क्या प्रस्तावित खदान को अनुमति देने से पहले स्वतंत्र जांच होगी? क्या मौजूदा खदानों के पर्यावरणीय एवं सुरक्षा मानकों की समीक्षा सार्वजनिक की जाएगी? और क्या ग्रामीणों की आपत्तियों को निर्णय प्रक्रिया में उचित महत्व मिलेगा? इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले समय में स्पष्ट होंगे।



