हमर छत्तीसगढ़

शाला संधारण की राशि डकार गई शिक्षा विभाग बालोद कोसागोंदी स्कूल का मामला

 

बालोद/पलारी:-छत्तीसगढ़ में स्वच्छता, सुशासन और शिक्षा सुधार के नाम पर करोड़ों रुपए के विज्ञापन, बैनर और आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि सरकारी स्कूलों को मिलने वाली मूलभूत स्कूल संधारण राशि तक नहीं दी जा रही। नतीजा यह कि शिक्षक पढ़ाने की जगह अपनी जेब से खर्च कर स्कूल चला रहे हैं और मानसिक, आर्थिक व शारीरिक शोषण झेलने को मजबूर हैं।इस सरकारी संवेदनहीनता का ज्वलंत उदाहरण गुरूर विकासखंड के ग्राम कोसागोंदी में संचालित शासकीय प्राथमिक शाला है। यहां पदस्थ शिक्षक डामन लाल पटेल ने शिक्षा सत्र 2024-25 के अक्टूबर माह में स्कूल परिसर को बच्चों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ बनाने के उद्देश्य से खुद पहल की। स्कूल मैदान में फैली घास-फूस, जहरीले कीड़े-मकोड़ों और संभावित दुर्घटनाओं से बच्चों को बचाने के लिए मजदूर लगाकर सफाई कराई गई। जर्जर कक्षाओं में फर्श, दीवारों का सीमेंटीकरण, समतलीकरण और रंगरोहण कराया गया ताकि बच्चे सम्मानजनक वातावरण में पढ़ सकें।विडंबना यह है कि इन सभी कार्यों का भुगतान आज तक शिक्षा विभाग ने नहीं किया। शिक्षक द्वारा पूरे दस्तावेज, बिल और आवेदन विभाग में जमा किए गए, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद राशि आबंटित नहीं हुई। मजबूर होकर शिक्षक डामन लाल पटेल को अपनी निजी आय से यह पूरा खर्च उठाना पड़ा। यही नहीं, भुगतान न मिलने के कारण वे लगातार मानसिक तनाव में हैं, जिसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और शैक्षणिक माहौल पर पड़ रहा है।एक ओर सरकार शिक्षा को प्राथमिकता बताकर मंचों से भाषण दे रही है, वहीं दूसरी ओर स्कूलों की हालत सुधारने वाले शिक्षकों को अनदेखा कर अपमानित किया जा रहा है। हालात इतने शर्मनाक हैं कि शिक्षकों को पढ़ाने के बजाय कभी आवारा कुत्तों की निगरानी, कभी शराब भट्टियों पर ताले लगवाने जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझाया जा रहा है। यह सब तथाकथित “सुशासन” की असल तस्वीर उजागर करता है।इस पूरे मामले पर कांग्रेस के स्थानीय नेता (कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,“यह सरकार शिक्षा विरोधी मानसिकता के साथ काम कर रही है। स्कूलों को संधारण राशि नहीं देकर शिक्षकों को मजबूर किया जा रहा है कि वे अपनी जेब से खर्च करें। यह सीधा-सीधा शोषण है। अगर शिक्षक ही आर्थिक बोझ में दबे रहेंगे तो बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा? कांग्रेस इसकी कड़ी निंदा करती है और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग करती है।”कुल मिलाकर, सरकार के स्वच्छता और विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। बिना समय पर फंड, बिना सम्मान और बिना जवाबदेही के शिक्षा व्यवस्था का विकास सिर्फ एक झूठा नारा बनकर रह गया है। जब तक जमीनी स्तर पर स्कूलों और शिक्षकों को उनका हक नहीं मिलेगा, तब तक “विकसित प्रदेश” का सपना महज दिखावा ही रहेगा।

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