बालोद ब्लॉक शिक्षा विभाग सवालों के घेरे में व्यवस्था, आरोपों की दलदल में अधिकारी

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में सूत्रों और शिक्षको से जो बातें सामने आ रही हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। कहा जा रहा है कि बालोद ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कार्यालय में छोटे से छोटे काम से लेकर बड़े फैसलों तक, हर फाइल की कीमत तय है। स्थानांतरण हो, अवकाश हो, वेतन संबंधी सुधार हो या विभागीय प्रक्रिया—हर जगह सिर्फ एक ही चर्चा है पैसा।शिक्षा विभाग आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। लेकिन यह पहचान गुणवत्ता, पारदर्शिता या बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की वजह से नहीं—बल्कि अव्यवस्था, आरोपों और कथित भ्रष्टाचार की चर्चाओं के कारण बन चुकी है। जनता के बीच यह सवाल तेजी से तैर रहा है कि क्या शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि “कमाई का जरिया” बन चुकी है?जनता का आरोप है कि वर्तमान में जिन अधिकारी को प्रभारी ब्लॉक शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है, उनका मूल पद एबीओ है, लेकिन भूमिका ऐसी निभाई जा रही है मानो यह पद सेवा के लिए नहीं, बल्कि “सिस्टम से फायदा उठाने” के लिए मिला हो। शिक्षकों के बीच यह डर का माहौल है कि बिना “खर्चा-पानी” के कोई काम आगे नहीं बढ़ता।सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह सब गलत है, तो फिर इन चर्चाओं पर अब तक कोई स्पष्ट जवाब क्यों नहीं आया? क्यों शिक्षक खुले मंच पर बोलने से डर रहे हैं? क्यों हर शिकायत फाइलों में दबकर रह जाती है?ग्रामीण इलाकों के शिक्षक बताते हैं कि उन्हें महीनों तक कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई तो यह भी कहते हैं कि “बिना संकेत समझे” काम की उम्मीद करना बेवकूफी मानी जाती है। क्या यही है शिक्षा विभाग की कार्यशैली? क्या बच्चों का भविष्य ऐसे ही सौदेबाजी की भेंट चढ़ेगा?जनता पूछ रही है—क्या शिक्षा विभाग अब दलालों और बिचौलियों के भरोसे चल रहा है?क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कुर्सी की ताकत का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए कर रहे हैं?और अगर नहीं, तो फिर जांच से डर क्यों?यह भी सवाल उठता है कि जिला प्रशासन और उच्च शिक्षा अधिकारी आखिर चुप क्यों हैं? क्या उन्हें यह सब दिखाई नहीं देता, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखी की जा रही है? अगर शासन-प्रशासन सच में ईमानदार है, तो निष्पक्ष जांच से पीछे क्यों हट रहा है?यह सिर्फ शिक्षकों का मुद्दा नहीं है, यह उन हजारों बच्चों का भविष्य है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। जब शिक्षक मानसिक दबाव, आर्थिक शोषण और डर के साये में काम करेगा, तो वह शिक्षा कैसे देगा?अब समय आ गया है कि जनता चुप न रहे। यह मांग सिर्फ आरोप लगाने की नहीं है, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की है। अगर आरोप गलत हैं, तो सच सामने आना चाहिए। और अगर सही हैं, तो जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।शिक्षा विभाग कोई निजी दुकान नहीं, यह समाज की रीढ़ है। और अगर इसी रीढ़ में भ्रष्टाचार का कीड़ा लग गया, तो पूरे सिस्टम का गिरना तय है।अब सवाल सिर्फ इतना है क्या बालोद का शिक्षा विभाग खुद को निर्दोष साबित करेगा, या जनता के शक को सच साबित होने देगा?अब इस संपूर्ण प्रकरण में एक और गंभीर चेतावनी उभरकर सामने आई है।यदि प्रशासन और सरकार ने उचित समय पर इस पर ध्यान नहीं दिया, तो प्रेस रिपोर्टर्स क्लब के प्रदेश अध्यक्ष ने साफ़ शब्दों में चेताया है कि इस मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर सचिवालय तक कड़ा संघर्ष किया जाएगा। यह जंग केवल पत्रकारों या शिक्षकों की नहीं, अपितु संपूर्ण शिक्षा प्रणाली और भावी पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने की होगी।



