प्रेस के नाम पर खेल बंद हो अपंजीकृत गुण्डरदेही अर्जुंदा प्रेस क्लब’ पर उठे सवाल अब कार्रवाई की मांग तेज

रिपोर्टर:- उत्तम साहु , गोपाल निर्मलकर
बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में नगर पंचायत अर्जुन्दा के बाजार चौक में 15 मार्च 2026 को प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अज्ञात सूत्रों से जानकारी मिली है कि यह आयोजन कथित “गुण्डरदेही-अर्जुन्दा प्रेस क्लब” के बैनर तले किया जा रहा है, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों और प्रारंभिक जांच में यह तथ्य सामने आया है कि इस नाम से संचालित संस्था का किसी भी सक्षम प्राधिकारी, विशेष रूप से Registrar of Societies के पास कोई वैध पंजीकरण उपलब्ध नहीं है। इस पर निशा कुमारी के कहा कि यही तथ्य पूरे मामले को गंभीर बना देता है, क्योंकि “प्रेस क्लब” जैसा संवेदनशील और प्रतिष्ठित शब्द केवल वैधानिक रूप से पंजीकृत संस्था द्वारा ही उपयोग किया जाना चाहिए। बिना पंजीकरण इस नाम का प्रयोग न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि यह पत्रकारिता जैसे जिम्मेदार पेशे की गरिमा पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।शिकायत में सबसे बड़ा आरोप यह है कि इस कथित संस्था द्वारा कार्यक्रम के प्रचार में कई राजनीतिक और सामाजिक व्यक्तियों के नामों का उपयोग किया गया है। ऐसे नामों को विज्ञापन और निमंत्रण में शामिल कर आम जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि यह संगठन अधिकृत और मान्यता प्राप्त है। जबकि वास्तविकता कुछ और ही दिखाई दे रही है। यह स्थिति न केवल भ्रम फैलाने वाली है बल्कि सामाजिक विश्वास के साथ खिलवाड़ भी मानी जा रही है।इसके साथ ही एक और गंभीर आशंका भी सामने आई है—अनधिकृत वसूली की। अक्सर देखा गया है कि अपंजीकृत संगठन पत्रकारिता की आड़ में निजी लाभ कमाने, दबाव बनाने या अनैतिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए “प्रेस” शब्द का दुरुपयोग करते हैं। यदि ऐसी कोई गतिविधि यहां भी पाई जाती है तो यह न सिर्फ कानून का उल्लंघन होगा, बल्कि समाज में पत्रकारों की साख को भी ठेस पहुंचाएगा।कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई संस्था बिना वैध पंजीकरण के स्वयं को “प्रेस क्लब” के रूप में प्रस्तुत करती है और उसके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करती है, तो यह भ्रामक प्रस्तुति (Misrepresentation) और अवैध संगठन संचालन की श्रेणी में आ सकता है। ऐसे मामलों में प्रशासन जांच कर आवश्यक दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है, जिसमें कार्यक्रम पर रोक, संगठन के संचालन पर प्रतिबंध और संबंधित व्यक्तियों पर कानूनी प्रावधानों के तहत कार्यवाही शामिल हो सकती है।अब स्थानीय पत्रकारों और जागरूक नागरिकों की ओर से यह मांग उठ रही है कि प्रशासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करे। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो कानून के दायरे में सख्त कदम उठाए जाएं ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति या समूह पत्रकारिता के नाम का गलत इस्तेमाल करने की हिम्मत न कर सके।स्पष्ट है कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और लोकतंत्र का प्रहरी है। ऐसे में यदि कोई संस्था इस पवित्र नाम का उपयोग केवल दिखावे या निजी स्वार्थ के लिए करती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होना ही चाहिए। अब निगाहें प्रशासनिक निर्णय पर टिकी हैं—क्या कानून अपना काम करेगा या फिर “प्रेस” के नाम पर यह खेल यूं ही चलता रहेगा।



