70 साल की खेती पर फर्जीवाड़े का साया!
सरकारी रिकॉर्ड से खिलवाड़ प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

संपादक :- मीनू साहू
मोहला-मानपुर:- छत्तीसगढ़ के मोहला मानपुर जिला के ग्राम पंचायत मुरारगोटा थाना खड़गाँव में सरकारी भूमि, राजस्व अभिलेख और ग्रामसभा की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करने वाला मामला अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। ग्राम मुरारगोटा तहसील खड़गाँव की लगभग 25 एकड़ भूमि, जिसे पुराने राजस्व रिकॉर्ड में छोटे झाड़ और बड़े झाड़ जंगल के रूप में दर्ज बताया गया है, उस पर दशकों से काश्तकारी करने वाले परिवार ने आरोप लगाया है कि बिना वैधानिक आधार, बिना ग्रामसभा की स्वीकृति और संदिग्ध परिस्थितियों में बाहरी व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया। वर्ष 2007 से लगातार शिकायतें, ग्रामसभा के प्रस्ताव, नाम विलोपन की मांग तथा जांच की प्रक्रिया चलती रही, फिर भी आज तक स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आया। सवाल यह उठ रहा है कि यदि शिकायतें वर्षों से लंबित थीं, तो आखिर जिम्मेदार विभाग कार्रवाई से क्यों बचता रहा?
दस्तावेज़ों के मुताबिक शिकायतकर्ताओ का कहना है कि उनके पूर्वज 1958-59 से भूमि पर काबिज होकर खेती करते आ रहे हैं और ग्राम पंचायत से लेकर स्थानीय ग्रामीण तक इस तथ्य से परिचित हैं। इसके बावजूद रिकॉर्ड में कथित बदलाव ने पूरे मामले को संदेहास्पद बना दिया है। इतना ही नहीं, इस विवादित भूमि को किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है।कोर्ट में केस दर्ज है तो खरीदी बिक्री कैसे हो गया क्या यह प्रशासनिक निष्क्रियता का परिणाम है, जिससे पूरे प्रकरण ने और गंभीर रूप ले लिया है? यह घटना राजस्व व्यवस्था, ग्रामसभा की वैधानिक प्रक्रिया और सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि सरकारी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर हुआ, तो क्या राजस्व विभाग ने समय रहते इसकी जांच और सुधार के लिए अपेक्षित कार्रवाई की? और इतने वर्षों तक जांच अधर में क्यों लटकी रही? यह भूमि पुराने अभिलेखों में जंगल के रूप में दर्ज है, तो ऐसे में स्वामित्व अथवा नामांतरण किया जाना गंभीर कानूनी जांच का विषय बनता है।
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के प्रावधान राजस्व अभिलेखों की नामांतरण और रिकॉर्ड संशोधन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य हैं। वहीं भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वन भूमि अथवा वन प्रकृति की भूमि में कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक मानी गई है। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के 20 सूत्रीय कार्यक्रम में भी सरकारी भूमि की सुरक्षा, अतिक्रमण की रोकथाम, पारदर्शी प्रशासन, गरीब एवं वास्तविक काश्तकारों के हितों की रक्षा तथा शिकायतों के समयबद्ध निराकरण पर विशेष जोर दिया गया है।



