अपने स्वर्गवासी पिता के बदले शिक्षक बेटे ने अपनी पत्नी को दिला दी अनुकंपा भ्रष्टाचार का भयानक खेल

बालोद:- छत्तीसगढ़ के जिला शिक्षा कार्यालय बालोद ने एक ऐसा घिनौना कारनामा किया जिसने शिक्षक संहिता, नियमों और इंसाफ की सारी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। चारवाही के एक शिक्षक ने अपने पिता के मृत्यु पश्चात् फर्जी दस्तावेज तैयार कर कूटरचना से अपनी ही पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति दिला दी। यह कोई गलती नहीं—यह योजनाबद्ध साजिश थी, जो बालोद शिक्षा विभाग की भ्रष्ट मानसिकता और गिरे हुए तंत्र की पोल खोलती है। जिससे विभाग की पवित्रता पर कलंक का धब्बा लग गया।सूचना के अधिकार कार्यकर्ता यशवंत निषाद द्वारा निकाले गए दस्तावेजों ने पूरे जिले को हिला कर रख दिया है। यह फाइलें गवाही दे रही हैं कि किस तरह “सिक्कों की खनक” पर अधिकारी-कर्मचारी नाचने लगे। जब शिक्षा विभाग के अंदर ही रिश्वत की गंध से निर्णय लिए जाएँ, तो फिर शिक्षक संहिता केवल दिखावा बनकर रह जाती है।इस पूरे प्रकरण में शिक्षक संहिता की धारा 3(1)(a), 3(2), और 7(1) का खुला उल्लंघन हुआ है — जिसमें स्पष्ट है कि किसी सरकारी पद पर नियुक्ति पारदर्शी, सत्यापित दस्तावेज़ों और नैतिक आचरण के आधार पर होनी चाहिए। इसके विपरीत यहाँ झूठे प्रमाणपत्र, साजिश और रिश्वतखोरी के बूते अनुकंपा नियुक्ति का नाटक रचा गया।भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेज़ का उपयोग) और 120B (षड्यंत्र) के अंतर्गत यह कृत्य सीधे-सीधे आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता है। परंतु बालोद जिला शिक्षा विभाग के कुछ अफसरों ने आँख मूँदकर इस काले खेल पर मुहर लगा दी।अब सवाल उठता है — जब चारवाही के छोटे से पद पर बैठे शिक्षक इस हद तक सिस्टम को ठेंगा दिखा सकते हैं, तो ऊँचे पदों पर बैठे अधिकारी क्या-क्या खेल खेल रहे होंगे? यह सिर्फ अनुकंपा नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा तंत्र की नैतिक मौत का प्रतीक है। सामाजिक कार्यकर्ता और प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद के जिलाध्यक्ष तरुण नाथ योगी ने इस पूरे मामले को उजागर कर जिले की कारनामा को सामने ला दिया है। उन्होंने इस भ्रष्टाचार को लेकर शासन से कड़ी कार्रवाई की माँग की है। उनका कहना है कि ऐसे शिक्षक और अधिकारी जो नियमों का सौदा कर रहे हैं, उन्हें तत्काल निलंबित कर जेल भेजा जाए।पर अफसोस — बालोद के शिक्षा भवन में “अनुकंपा” अब सहानुभूति नहीं, बल्कि सौदेबाजी का नया माध्यम बन चुका है। नियमों को जेब में रखकर और पैसे को भगवान मानकर फैसले लिए जा रहे हैं। यह कृत्य न केवल नैतिक अपराध है, बल्कि संविधान और कानून दोनों की आत्मा पर प्रहार है।अब ज़रूरत है कि शासन इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए, ताकि बालोद शिक्षा विभाग में फैली भ्रष्टाचार की जड़ें उखाड़ी जा सकें। जब तक दोषियों पर शिकंजा नहीं कसता, तब तक “शिक्षा” शब्द की गरिमा केवल फाइलों में दम तोड़ती रहेगी।बालोद का यह घोटाला केवल एक नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि एक तंत्र की लाचारी, एक भ्रष्ट व्यवस्था की बू, और इंसाफ की मारी जनता के भरोसे की चीत्कार है। अगर अब भी शासन मौन रहा — तो यह चुप्पी आने वाले पीढ़ियों के भविष्य पर सबसे बड़ा अपराध होगी।



